Archives 2026

दीपावली

लाई हूँ आँचल में भरकर उजाला
अँधेरे दिलों को जो रोशन करेगा।
खुशियाँ मनाओ यह है मेरा संदेशा,
गम का ना साया तुम पर पड़ेगा।


लाई हूँ शुभ को मैं साथी बनाकर,
हर एक उद्यम जो सफल करेगा।
काल को अपना अनुचर बनाकर,
अमंगल नहीं सिर्फ मंगल करेगा।


लाई हूँ राम को मैं वापस अयोध्या,
हर एक उजाड़ जो आबाद करेगा।
टूटे हुए हृदयों के टुकड़े जोड़कर,
उनमे जीवन का संचार करेगा ।


लाई हूँ नयनों में जीवन की ज्योति,
कर्मपथ जिससे प्रकाशित होगा।
अपना लो इनको न सोचो जरा भी,
अंधकार का नामोनिशां न रहेगा।४

लाई हूँ होंठों पर प्रार्थनाएं सजाकर,
हर शब्द जिनका स्वीकार होगा।
उठकर मुझे तुम गले से लगा लो,
हर दर्द तुम्हारा, तुम्हारा न होगा।


लाई हूँ लक्ष्मी को अंगुली पकड़कर,
घर-द्वार तुम्हारा समृद्ध होगा।
मत खोना ऐसा स्वर्णिम अवसर,
सिर्फ आज मिला है— कल नहीं मिलेगा।



कवि चेतन कुमार गुप्ता

घर के सामने सड़क किनारे लगा पेड़

तू बसा है हमारी यादों में, जो चला गया छोड़कर बहुत आएगा आँखों में।
जब से हमने संभाला था होश तुझे लहलहाते पाया था अपने आँगन में।
अब जब तुझे मिटा दिया जाएगा यहाँ से,हमारे दिल का एक कोना अंधेरा हो जाएगा। अब जेठ की चिलचिलाती धूप में ,वो सुकून भरा नज़ारा न होगा।
गुज़रने वाले मुसाफिरों का अनायास ठहरना न होगा ,और हम भी शायद अब घर से बाहर न निकलें दोपहर में,
क्योंकि तुम्हारे स्थान का यह सुनापन हमारी आँखों में खटकेगा ।
याद आएगा हमें तुम पर वो फूलों का खिलना,झुलसाती हुई गर्मियों में वो ठंडी छाँव देना।
सोचते हैं अब सुबह-शाम हम किसकी पत्तियाँ बुहारेंगे,तुम्हारे बिना लोग हमारे घर का पता कैसे पहचानेंगे।
तुम तो एक पल में छोड़ जाओगे हमें वर्षों साथ रहने के बाद,पर क्या कभी सोचा है तुमने …………………….

……………………कि हम तुम्हें कैसे भूल पाएंगे।

-कवि चेतन कुमार गुप्ता

वृक्ष की वेदना

बड़ी मुश्किल से बनाया है हमने ये घर ………….
मत तोड़ो इसे प्लीज …………….

कितना मर्महीन, तू हो गया है मानव
यह कहता है आज मेरा मन।
मैं खड़ा था, मैं अड़ा था,
समेटे था अपने में कितने ही जीवन।

सोचता था कि मैं तेरा, तू मेरा है,, लेकिन
दो ही पलों में कर दिया धराशायी,
तूने पराया बनाकर।
कितना मर्महीन, तू हो गया है मानव।

उन पंछियों से पूछ वेदना व्यथा-वेदना की कथा,
जिन्होंने तृण-तंतु जोड़ कितने ही, कैसे घर बनाया।
कैसे उसमें नवजीवन का श्रृंगार किया,
कैसे उसे सींचा, पाला-पोसा, उम्मीदों का संसार बसाया।

अब पूछता हूँ मैं तुझसे …

क्या अपराध था मेरा, क्या बिगाड़ा था उन बेजुबानों ने, जो बेरहम होकर तूने मिटा दिया अस्तित्व हमारा।
कितना मर्महीन तू हो गया है मानव। अरे सिर्फ रास्ता ही तो बनाना था तुझे,
वह तो बन ही सकता था मेरे आगे या पीछे से। अगर थोड़ी सी करुना तू दिखाता और हमें बचा जाता
गुणगान करते जहाँ जाते तेरे सहदय होने का।

गूँज उठता गगन विशाल, पंछियों के कलरव से ,यह धरा भी जीवंत हो जाती ,इन मधुर ध्वनियों

देख लेते कर्तव्य पथ पर इस तरफ हम भी, इससे कर्तव्य निभते करुणा पुरुष की।

धन्य वृक्ष, धन्य पक्षी, नहीं रखते कोई द्वेष इस जमाने से।

— C.K. Gupta